Friday, May 15, 2009

:-(

ऐ दर्र्पोक तू क्या करेगा यहाँ
यहाँ तो तेरे साथ कोई नहीं
बस अकेले लड़ने में तुझे क्या मज्जा
जब कोई नहीं तेरी काम का यहाँ

बस बैठा रह इक कोने में तू
जहाँ कोई नहीं तेरे मतलब का
जिधर देखो वहां बस
तेरे ही कमरे में तू अकेला है!

फिर तू कहे के कुछ नहीं होगा
नहीं कोई नहीं इस देश का
तू तो बस एक लक्द्डे का वोह टुकडा
जो कटने पर भी कुछ नहीं काम का!

अरे छोड़ यह दुनिया के झमेला
मस्त हो जा खुद की ही ख़ुशी में
किसी का कुछ भी जो जाए तुझे क्या?
खुश रह तू अपने ही गम में!

कोई क्या सोचे तुझे क्या?
किसी को बुरा लगे तुझे क्या?
नशे में हो जा तू टुन्न
सो जा अपनी ही धुन में तू!

किस्मत तोह सुबकी अच्च्ची होती है
बस नजरिया सबका जुदा
क्रांति कारियों को की आवाज़
मुर्दों की वो पुकार

कैसे भुला पाएगा तू
जो आग तेरे सीने में है
जलता रेह तू उस्सी आग में
जलाता रेह तू खुदीको अब!

सो जा तू अब उस्सी बिस्तर में
सपनो में रंग जा तू
क्यों सोचता है तू इन् सब के बारें में
जब की बकवास है यह सब!

Apoorva

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